छत्तीसगढ़

राजनीति में विरोध या दुश्मनी? उत्तर और दक्षिण भारत की सोच ने छेड़ी नई बहस

       लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और हारने का खेल नहीं होता, यह समाज के राजनीतिक संस्कारों और लोकतांत्रिक मूल्यों का भी आईना होता है। चुनावों के बाद नेताओं का व्यवहार, दलों का चरित्र और विरोधियों के प्रति दृष्टिकोण यह तय करता है कि राजनीति सत्ता की भूख से संचालित हो रही है या जनहित की भावना से।

       हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने देश के दो हिस्सों—उत्तर और दक्षिण भारत—की राजनीति के बीच एक गहरी रेखा खींच दी है। बंगाल और तमिलनाडु, दोनों राज्यों में लगभग एक साथ चुनाव हुए। दोनों जगह सत्तारूढ़ दल सत्ता से बाहर हुए, लेकिन चुनाव बाद की तस्वीरें बिल्कुल भिन्न रहीं।

       बंगाल में राजनीतिक संघर्ष सड़कों पर उतर आया। आरोप, प्रत्यारोप, कटु बयान और राजनीतिक टकराव ने वातावरण को तनावपूर्ण बना दिया। ऐसा लगा जैसे चुनाव लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि युद्ध रहा हो, जिसमें विरोधी दल प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि शत्रु बन गए हों।

       लेकिन तमिलनाडु की तस्वीर दूसरी थी। वहां हार के बाद डीएमके ने ऐसा कदम उठाया जिसने राजनीति को एक अलग ऊंचाई देने का प्रयास किया। विजय थलपति की पार्टी पूर्ण बहुमत से कुछ कदम दूर थी। ऐसे समय में एम.के. स्टालिन ने अपने सहयोगी दलों से कहा कि वे नई सरकार के गठन और स्थिरता के लिए समर्थन दें। सत्ता हाथ से निकलने के बाद भी स्थिरता को प्राथमिकता देना राजनीति में दुर्लभ दृश्य माना जाएगा।

       शपथ ग्रहण के बाद विजय का स्टालिन के आवास पहुंचना और उन्हें शाल ओढ़ाकर सम्मान देना केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी; वह भारतीय राजनीति के लिए एक प्रतीकात्मक संदेश था—“विरोधी, दुश्मन नहीं होता।”

       यह दृश्य सोचने को मजबूर करता है कि आखिर उत्तर भारत और दक्षिण भारत के राजनीतिक संस्कारों में इतना अंतर क्यों दिखाई देता है? क्या राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम बनती जा रही है? क्या विरोधियों को हराने से आगे बढ़कर उन्हें समाप्त करने की मानसिकता विकसित हो रही है?

       आज का राजनीतिक परिदृश्य कई सवाल छोड़ जाता है। क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनावी जीत रह गया है? क्या राजनीतिक दल विचारधारा से अधिक सत्ता की गणित में उलझ गए हैं? क्या संस्थाओं का इस्तेमाल प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करने के लिए होना चाहिए?

       कभी राजनीति संवाद की भाषा बोलती थी। मतभेद थे, लेकिन मनभेद नहीं। विचारों का संघर्ष था, लेकिन व्यक्तिगत कटुता नहीं। विरोध था, लेकिन सम्मान भी था। आज वह परंपरा धीरे-धीरे धुंधली पड़ती प्रतीत होती है।

       शायद राजनीति को फिर से यह याद करने की आवश्यकता है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा मूल्य जीत नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व है। क्योंकि जब विरोधी दुश्मन बन जाता है, तब लोकतंत्र का सबसे सुंदर पक्ष—संवाद—धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

       और तब यह प्रश्न हर नागरिक के सामने खड़ा होता है—देश की राजनीति आखिर किस दिशा में जा रही है, और हम उसे किस दिशा में जाते हुए देखना चाहते हैं?

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