छत्तीसगढ़

खेतों में नई उम्मीद: कुसुम की खेती से बदल रही बालोद के किसानों की तस्वीर

       रायपुर। कृषि विभाग के कृषक चौपाल और फसल चक्र परिवर्तन के प्रति जागरूकता अभियान से प्रेरित होकर जिले के किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ-साथ तिलहन उत्पादन, विशेषकर कुसुम की खेती की ओर कदम बढ़ाए हैं।

       कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण का परिणाम है कि बालोद जिले में जिस कुसुम की खेती का रकबा पहले शून्य था, वह इस वर्ष बढ़कर 157 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। उन्नत बीजों का चयन, कतार पद्धति से बुआई और संतुलित उर्वरक प्रबंधन के कारण वर्तमान में फसल लाभदायक साबित हुआ है।

       स्थानीय किसानों के अनुसार, कुसुम की खेती कई मायनों में फायदेमंद है, कम जल खपत, इसे बहुत ही सीमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। यह फसल कम समय में तैयार हो जाती है और लागत भी न्यूनतम आती है। कुसुम की खेती मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। मौसम अनुकूल रहने पर अच्छी पैदावार से किसानों की आय दोगुनी होने की प्रबल उम्मीद है। घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से जिले के सभी विकासखंडों के 37 ग्रामों के 194 कृषकों ने पहली बार नवीन तिलहन फसल के रूप में कुसुम का प्रदर्शन लिया है। भविष्य में कुसुम की खेती के विस्तार हेतु बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। कुल कृषकों में से 79 कृषकों ने 101 हेक्टेयर क्षेत्र में बीज उत्पादन हेतु बीज निगम में पंजीयन कराया है। इससे आने वाले समय में जिले के किसानों को स्थानीय स्तर पर ही उन्नत बीज प्राप्त हो सकेंगे। साथ ही कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा खेतों का नियमित निरीक्षण और कीट प्रबंधन की जानकारी दी जा रही है, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर बनी हुई है। बालोद जिले के किसानों का यह सामूहिक प्रयास अब आसपास के क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है।

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