छत्तीसगढ़

जन संस्कृति मंच दुर्ग-भिलाई इकाई का आयोजन

‘देशद्रोह की हांडी’ पर हुई चर्चा गोष्ठी

मीता दास की कविताओं में सामयिक संदर्भ मुखर हैं – जयप्रकाश

       नेहरू नगर, भिलाई। जन संस्कृति मंच दुर्ग-भिलाई इकाई के तत्वावधान में कविता, कहानी और अनुवाद के क्षेत्र में चर्चित मीता दास की सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह ‘देशद्रोह की हांडी’ पर चर्चा गोष्ठी सम्पन्न हुई। इस गरिमामयी गोष्ठी का आयोजन सियान सदन, नेहरू नगर वेस्ट में किया गया जिसमें अंचल के जाने-माने साहित्यकारों, पत्रकारों, संस्कृतिकर्मियों, पाठकों सहित महाविद्यालयीन विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।

       मीता दास ने अपने कविता संग्रह से कुछ चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।

       गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक जयप्रकाश ने कहा, “मीता दास की कविताओं में सामयिक संदर्भ मुखर हैं। कोरोना काल की त्रासदी पर लिखी कविता ‘लाशें मांगता हुआ समय’ गहरी संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त हुई है।”

       मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने कहा कि मीता दास की कविताओं को पढ़ते हुए महत्वपूर्ण समकालीन साहित्यकार याद आ जाते हैं। उन्होंने मीता दास की कुछ कविताओं के शीर्षकों को चिह्नित करते हुए महत्वपूर्ण बताया। इस कविता संकलन के लिए उन्होंने मीता दास को बधाई दी।

       देश के नामचीन आलोचक सियाराम शर्मा ने कहा कि मीता दास की सबसे अच्छी कविताएँ स्मृतियों से जुड़ी कविताएँ हैं। घर, गाँव, कस्बे के परिवेश में छाई उदासियों का बिंबात्मक वर्णन उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाती हैं। कुछ लंबी कविताएँ अपने अंतिम छोर पर जाकर बिखर गई हैं। इन कविताओं में गठनात्मक कमी दिखाई देती है।

       कथाकार कैलाश बनवासी ने अपनी समीक्षा में कहा कि मीता दास की कविताएं प्रखर राजनैतिक बोध की कविताएँ हैं, जिसकी रेंज बहुत बड़ी है। ये देश की समकालीन समस्याओं से लेकर फिलीस्तीन, इजरायल, अमेरिका तक फैली है। जिनमें वह एक विश्व नागरिक के तौर पर अपना बयान रखती हैं, जो इधर के कवियों में कम दिख रहा है। इसके अलावा, उनका स्त्री विमर्श पितृसत्ता को सीधे चुनौती देती हैं, ‘क्या मैं कोई जमीन हूँ जो बाँट लोगे?’ उन्हें अपनी कविता के शिल्प पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

       विशेष अतिथि वरिष्ठ कवयित्री संतोष झांझी ने समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए बताया कि बांग्लाभाषी होने के बावजूद मीता दास ने अपने कविता संग्रह में हिंदी भाषा में परिपक्व कविताएं लिखी हैं। मीता दास की कुछ छोटी किन्तु महत्वपूर्ण कविताओं की ओर उन्होंने ध्यान आकर्षित किया।

       युवा कवि अंजन कुमार ने अपने आधार वक्तव्य में कहा कि मीता दास की कविताओं में लगातार अमानवीय और हिंसक होते जा रहे समय-समाज के प्रति गहरी चिंता, असंतोष और आक्रोश है। साथ ही उनकी कविताएँ सामाजिक सामंजस्य, न्याय और समरसता के महत्व पर बल भी देती है।

       वरिष्ठ साहित्यकार अनिता करडेकर ने अपने संबोधन में कहा कि मीता दास की कविताओं में तटस्थ दृष्टि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वें बड़ी सूक्ष्म और पैनी नज़र से सामयिक परिदृश्य की घटनाओं को देखती हैं। वे इसका आंकलन करती हुई अपनी कविताओं में प्रतिक्रिया भी देती हैं।

       चर्चित विशिष्ट कवि घनश्याम त्रिपाठी ने आलेख पढ़ते हुए कहा कि ‘देशद्रोही की हांडी’ कविता संग्रह में मीता दास की कविताएँ रूप और अंतर्दृष्टि से विविधता लिए हुए हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक सरोकारों का बोध गहराई से परिलक्षित होती है।

       रंगकर्मी जयप्रकाश नायर ने देशद्रोह की हांडी कविता संग्रह से ‘जानने की चाह’ व अन्य शीर्षक कविताओं का बेहतरीन पाठ प्रस्तुत किया।

       गोष्ठी का संचालन अशोक तिवारी, स्वागत उद्बोधन सुरेश वाहने, धन्यवाद ज्ञापन एन. पापा राव ने किया। गोष्ठी में विशेष रूप से वरिष्ठ कथाकार गुलबीर सिंह भाटिया, ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की उप-सभापति स्मृति दत्त, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य, ‘जनवादी लेखक संघ’ भिलाई-दुर्ग के अध्यक्ष शायर मुमताज, ‘जलेस’ के सचिव एवं ‘भिलाई वाणी’ के संपादक एल. रुद्रमूर्ति, शरद कोकास, डॉ. संध्या श्रीवास्तव, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, रंगकर्मी शक्ति चक्रवर्ती, मणिमय मुखर्जी, कथाकार ऋषि गजपाल, सुनीता नायडू, मनोरंजन दास, अंबरीश त्रिपाठी, पूर्णिमा साहू, विजय वर्तमान, वासुकि प्रसाद ‘उन्मत’, श्रमिक नेता श्यामलाल साहू, एम. धर्माराव, प्रिंयांजल एम. त्रिपाठी, बृजेन्द्र तिवारी, दिनेश सोलंकी, विद्याभूषण, प्रदीप गुप्ता, दिव्या, सोनिया नायडू, उमंग तिवारी आदि उपस्थित थे।

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