छत्तीसगढ़

सलाखों से बाहर आकर गूंजा विश्वास—कवासी लखमा का सच्चाई पर भरोसा

       रायपुर। सुबह की धूप अभी पूरी तरह फैली भी नहीं थी कि रायपुर सेंट्रल जेल के बाहर हलचल तेज होने लगी। निगाहें एक ही दिशा में टिकी थीं — उस लोहे के बड़े दरवाज़े पर, जिसके भीतर पिछले कई महीनों से छत्तीसगढ़ की राजनीति का एक बड़ा नाम बंद था।

दरवाज़ा खुला।

और बाहर आए कवासी लखमा

       पूर्व आबकारी मंत्री ने जैसे ही जेल की चौखट पार की, समर्थकों की भीड़ में हलचल दौड़ गई। किसी ने नारे लगाए, किसी ने हाथ हिलाया, तो किसी की आँखों में राहत साफ झलक रही थी। लखमा ने भीड़ की ओर हाथ उठाया — चेहरे पर थकान थी, लेकिन स्वर में दृढ़ता। उनके पहले शब्द थे —
“यह सच्चाई की जीत है।”

सुप्रीम कोर्ट से राहत, मगर शर्तों के साथ

शराब घोटाले के मामले में सुप्रीम कोर्ट से मिली अंतरिम जमानत ने उन्हें अस्थायी आज़ादी दी है, लेकिन यह आज़ादी सीमाओं के साथ आई है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि —

  • वे छत्तीसगढ़ से बाहर रहेंगे,
    (सिवाय कोर्ट पेशी या विधानसभा सत्र के दौरान)

  • पासपोर्ट जमा करना होगा

  • और अपना वर्तमान पता व मोबाइल नंबर स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज कराना होगा

       ये शर्तें प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) से जुड़े मामलों पर लागू रहेंगी।

आरोपों की पृष्ठभूमि

       कवासी लखमा पर ₹70 करोड़ के कथित शराब घोटाले में कमीशन लेने और एक सिंडिकेट संचालित करने के आरोप लगे थे।

       15 जनवरी 2025 से वे जेल में थे।

       करीब एक साल बाद, 3 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उन्हें अंतरिम जमानत देते हुए राहत दी।

       कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन यह फैसला उनके लिए एक बड़ा मोड़ जरूर माना जा रहा है।

जेल के बाहर भावनाओं का सैलाब

जेल के बाहर इंतज़ार कर रहे चेहरों में सबसे आगे थीं उनकी पत्नी कवासी बुदरी। लंबे इंतज़ार के बाद जब दोनों की नजरें मिलीं, तो शब्दों से ज्यादा भावनाएँ बोल रही थीं।

       साथ में विधायक विक्रम मंडावी और बड़ी संख्या में समर्थक मौजूद थे, जिनके चेहरों पर उत्साह और राहत साफ झलक रही थी।

       कांग्रेस नेताओं ने इस रिहाई को “सत्य की जीत” बताया, जबकि राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

आगे की राह

       जमानत ने लखमा को जेल से बाहर आने का अवसर दिया है, पर अदालत की शर्तें और लंबित जांच यह संकेत देती हैं कि असली लड़ाई अभी बाकी है।
राजनीति, कानून और जनभावनाओं के इस त्रिकोण में यह मामला आने वाले दिनों में और भी कई मोड़ ले सकता है।

       फिलहाल, रायपुर सेंट्रल जेल के बाहर गूंजते नारे इस बात के गवाह बने कि एक नेता की रिहाई सिर्फ कानूनी घटना नहीं, बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक क्षण भी होती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Adblock Detected

Please consider supporting us by disabling your ad blocker