छत्तीसगढ़रायपुर

जब कागज़ी कार्रवाई ने करुणा को पीछे छोड़ा

■ बेटे ने घर को ही बनाया ‘आईसीयू’
■ बेटे के सामने फर्ज और एसआईआर सत्यापन की दोहरी चुनौती

       कुम्हारी। वार्ड नं. 15, न. पा. कुम्हारी, पाटन विधानसभा के अंतर्गत 88 वर्षीय वयोवृद्ध मतदाता और रिटायर्ड प्रोफेसर यज्ञ व्रत श्रीवास्तव के भौतिक सत्यापन हेतु जारी नोटिस ने मानवीय संवेदनाओं और सिस्टम के बीच टकराव पैदा कर दी है। पिता की नाजुक स्थिति के कारण पुत्र शीलरत्न श्रीवास्तव उन्हें अत्यंत असहज स्थिति में अकेला या गैर-अनुभवी सेवक के सहारे छोड़कर केंद्र पहुँचने में असमर्थ रहे। पुत्र का मानना है कि पिता की सुरक्षा सरकारी औपचारिकताओं से ऊपर है।

मौत को मात, पर खतरा बरकरार:

       मेडिकल रिकॉर्ड्स (एसएमसी , उर्मिला हॉस्पिटल) के अनुसार, प्रोफेसर यज्ञ व्रत हार्ट फेलियर, क्रोनिक किडनी डिजीज, हृदय की धमनियों में रुकावट और पुराने हार्ट अटैक से क्षतिग्रस्त दिल जैसी जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे हैं। पुत्र की सजगता से हृदय की कार्यक्षमता में सुधार तो दर्ज हुआ है, किंतु यह संतुलन पूरी तरह से ‘लाइफ-सपोर्ट’ और निरंतर निगरानी पर टिका है। विशेषज्ञों के अनुसार, जरा सी भी मानवीय चूक या मॉनिटरिंग में गैप इस नाजुक सुधार को वापस ‘शून्य’ पर ला सकता है। 88 वर्ष की आयु में यह संतुलन तभी तक कायम है, जब तक उन्हें पल-पल ऑक्सीजन, नेबुलाइजेशन और तत्काल मेडिकल रिस्पॉन्स मिल रहा है।

रातभर जागकर रखते हैं नज़र:

       पुत्र शील रत्न ने बताया कि उन्हें वाइटल्स पर नज़र बनाए रखने के लिए अक्सर पूरी रात जागृत अवस्था में रहना पड़ता है। मरीज का शुगर लेवल अचानक न्यूनतम होने, बीपी के अत्यधिक उच्च होने या पल्स रेट में असाधारण उतार-चढ़ाव का जोखिम हर पल बना रहता है।

       विशेषज्ञों ने रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से मानीटरिंग वाइटल्स का निर्देश दिया है। इसका अर्थ है कि एक पल की भी चूक या अनुभवी अटेंडेंट का दूर होना मरीज के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ हो सकता है।

       मरीज की निरंतर देखरेख कर रहे डॉ. मोहनीश साहू (एमबीबीएस) ने बताया कि “मरीज विगत 4 वर्षों से मल्टी-ऑर्गन जटिलताओं से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में 50% बुजुर्ग अस्पताल पहुँचने से पहले दम तोड़ देते हैं, लेकिन शीलरत्न ने कई बार इमरजेंसी में त्वरित निर्णय लेकर पिता की जान बचाई है। वर्तमान में मरीज को 24 घंटे अनुभवी निगरानी की सक्त जरूरत है ताकि आकस्मिक संकट में बिना पल गँवाए अस्पताल ले जाया जा सके। अनुभवी अटेंडेंट अनुपस्थिति जानलेवा साबित हो सकती है।”

गणमान्य नागरिकों का मिला समर्थन:

       किशन राठौर ने शीलरत्न द्वारा चार सालों से घर को ही ‘आईसीयू’ जैसा बनाकर की जा रही पिता की सेवा को ‘मिसाल’ बताया है।

       साहित्यकार सुरेश वाहने ने मांग की है कि प्रशासन नियमों में न उलझाकर लम्बे समय से गंभीर रूप से बीमार वयोवृद्ध की जान की फिक्र करते हुए घर पर ही एसआईआर सत्यापन की व्यवस्था करें और मानवीयता का परिचय दे।

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